Rajput Rajvansh

तोमर/तंवर (Tomar/Tanwar) राजपूत इतिहास, कुलदेवी, गोत्र

तोमर/तंवर ( tomar/tanwar ) राजपूत वंश की कहानी और उनका भारतीय इतिहास में योगदान।
तोमर/तंवर (Tomar/Tanwar) राजपूत वंश का इतिहास महाभारत से जुड़ा हुआ है, और ये खुद को चंद्रवंशी मानते हैं।


तोमर/तंवर (Tomar/Tanwar) राजपूत एक प्रमुख और प्राचीन राजपूत वंश से संबंधित हैं, जो खुद को चंद्रवंशी (Chandravanshi) मानते हैं। इनका संबंध महाभारत (Mahabharat) के महान वीर अर्जुन (Arjun) से है और उनका वंश अभिमन्यु (Abhimanyu) और परीक्षित (Parikshit) तक जाता है। तोमर/तंवर (Tomar/Tanwar) राजपूतों की ऐतिहासिक राजधानी धिल्लिका (Dhillika) थी, जिसे बाद में दिल्ली (Delhi) के नाम से जाना गया। तोमर (Tomar) वंश के महान राजा अनंगपाल तोमर I (Anangpal Tomar I) ने 792 ईस्वी में दिल्ली की स्थापना की और इसे एक महत्वपूर्ण राजनीतिक और सांस्कृतिक केंद्र बनाया। इनके साम्राज्य का विस्तार दिल्ली (Delhi), हरियाणा (Haryana) और पश्चिमी उत्तर प्रदेश (Western UP) तक हुआ। तोमर (Tomar) राजपूतों का सबसे प्रसिद्ध किला लाल क़ोट (Lal Kot) था, जो दिल्ली का पहला किला था। इनके वंश की कुलदेवी चिल्लासन माता (ChillayMata) है और उनका गोत्र गर्ग्य (Gargya) है। आज भी तोमर/तंवर (Tomar/Tanwar) राजपूत अपनी ऐतिहासिक विरासत और वीरता के लिए सम्मानित किए जाते हैं।


तोमर/तंवर (Tomar/Tanwar) राजपूत का इतिहास



बहुत समय पहले, जब भारत में विभिन्न राज्य और किलों का शासन था, तोमर (Tomar) या तंवर (Tanwar) राजपूतों का नाम वीरता और सम्मान के साथ लिया जाता था। इनका वंश महाभारत के महान योद्धा अर्जुन से जुड़ा हुआ था, और उनका रक्तline परीक्षित तक जाता था। यह राजपूतों का एक प्राचीन और शक्तिशाली परिवार था, जो खुद को चंद्रवंशी मानते थे, और उनकी इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका थी।

कहा जाता है कि राजा अनंगपाल तोमर I ने 792 ईस्वी में दिल्ली (Delhi) का पुनर्निर्माण किया और उसे एक नई पहचान दी। उन्होंने धिल्लीका (Dhillika) नामक एक नगर स्थापित किया, जो बाद में दिल्ली के रूप में प्रसिद्ध हुआ। अनंगपाल का साम्राज्य दिल्ली (Delhi), हरियाणा (Haryana) और पश्चिमी उत्तर प्रदेश (Western UP) तक फैला हुआ था। उन्होंने अपनी राजधानी को मजबूत किलों और दीवारों से घेर लिया, जिनमें सबसे प्रसिद्ध लाल क़ोट (Lal Kot) था, जो आज भी दिल्ली में एक ऐतिहासिक धरोहर के रूप में मौजूद है।

समय के साथ, तोमर (Tomar) राजपूतों का साम्राज्य बढ़ता गया। लेकिन जैसे-जैसे वे शक्तिशाली होते गए, उन्हें आसपास के सम्राटों से प्रतिस्पर्धा का सामना भी करना पड़ा। अनंगपाल तोमर II के समय में, जब वह बूढ़े हो गए, उन्होंने अपने पोते प्रिथ्वीराज चौहान को दिल्ली (Delhi) का केयरटेकर (Caretaker) बना दिया, क्योंकि उनके खुद के बेटे छोटे थे। हालांकि, यह कहानी बहुत ही रोचक मोड़ लेती है। कहा जाता है कि जब प्रिथ्वीराज चौहान ने दिल्ली का राज संभाला, तो उन्होंने कभी भी अपने दादा को सत्ता वापस नहीं दी, और चौहान (Chauhan) राज का उदय हुआ।

इस तरह से, तोमर (Tomar) राजपूतों का साम्राज्य धीरे-धीरे खत्म हो गया, लेकिन उनकी वीरता, शौर्य और ऐतिहासिक योगदान आज भी लोगों के दिलों में जीवित है। उनकी कुलदेवी योगेश्वरी (Yogeshwari) मानी जाती है, और उनका गोत्र गर्ग्य (Gargya) है। आज भी, तोमर (Tomar) और तंवर (Tanwar) राजपूतों को उनकी अद्भुत विरासत और गौरवमयी इतिहास के लिए सम्मानित किया जाता है।



तोमर/तंवर (Tomar/Tanwar) कुलदेवी



तोमर (Tomar) और तंवर (Tanwar) राजपूतों की कुलदेवी (Kuldevi) चिल्लासन माता (Chillay Mata) मानी जाती हैं। चिल्लासन माता को शक्ति की देवी के रूप में पूजा जाता है, और इनकी पूजा खासकर तोमर राजपूतों के बीच बहुत श्रद्धा और आस्था के साथ की जाती है।

चिल्लासन माता की पूजा तोमर/तंवर परिवारों के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक परंपरा है। कहा जाता है कि चिल्लासन माता ने अपने भक्तों को संकटों से बचाया और उन्हें विजय और समृद्धि की दिशा में मार्गदर्शन किया।

तोमर और तंवर परिवारों के लोग आज भी चिल्लासन माता की पूजा करते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इनकी पूजा में विशेष रूप से व्रत, हवन, और पूजा पाठ किया जाता है। चिल्लासन माता के मंदिर कई स्थानों पर हैं, जिनमें तोमर/तंवर परिवार के धार्मिक केंद्रों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।




तोमर/तंवर (Tomar/Tanwar) गोत्र: गर्ग्य (Gargya)



तोमर (Tomar) और तंवर (Tanwar) राजपूतों का गोत्र (Gotra) गर्ग्य (Gargya) है, जो भारतीय समाज में एक प्रतिष्ठित और प्राचीन गोत्र के रूप में माना जाता है।

गर्ग्य गोत्र का संबंध प्राचीन भारतीय ऋषि ऋषि गर्ग से जोड़ा जाता है। ऋषि गर्ग वेदों और पुराणों में प्रसिद्ध विद्वान और संत माने जाते हैं। उनका योगदान भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर में अतुलनीय है। ऋषि गर्ग ने न केवल वेदों का अध्ययन किया, बल्कि उन्होंने गणित, खगोलशास्त्र, और अन्य शास्त्रों में भी गहरी विद्वता हासिल की।

गर्ग्य गोत्र के वंशजों को महानता, शौर्य और विद्वत्ता का प्रतीक माना जाता है। यह गोत्र तोमर और तंवर राजपूतों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इनकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को गर्ग्य गोत्र से ही पहचान मिलती है। तोमर/तंवर परिवारों में यह गोत्र एक सम्मानजनक पहचान है और इसे परिवार की प्रतिष्ठा और शौर्य का प्रतीक माना जाता है।

आज भी गर्ग्य गोत्र के लोग अपने दार्शनिक और धार्मिक मूल्यों को बनाए रखते हुए समाज में योगदान कर रहे हैं। इस गोत्र के लोग अपने पूर्वजों के आदर्शों और शिक्षा का पालन करते हुए जीवन में उत्कृष्टता की दिशा में अग्रसर रहते हैं।

तोमर/तंवर राजपूतों का गर्ग्य गोत्र न केवल उनके परिवार के इतिहास को दर्शाता है, बल्कि यह भारतीय समाज के महान ऋषियों की परंपरा को भी जीवित रखता है। यह गोत्र उनकी संस्कृति, शौर्य और धार्मिक विश्वासों का अहम हिस्सा है, जो उन्हें एक अद्वितीय पहचान देता है।

गर्ग्य गोत्र की परंपरा और विरासत, तोमर और तंवर परिवारों में आज भी मजबूत है, और यह उन लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है जो अपनी जड़ें और इतिहास से जुड़े रहकर अपना मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं।


तोमर/तंवर (Tomar/Tanwar) राजधानी



तोमर/तंवर राजपूतों की राजधानी धिल्लिका (Dhillika) थी, जिसे बाद में दिल्ली के नाम से जाना गया।

तोमर वंश के महान राजा अनंगपाल तोमर I के शासनकाल में 8वीं सदी में धिल्लिका की स्थापना की गई थी, जो बाद में दिल्ली के रूप में विकसित हुआ। इस समय दिल्ली का क्षेत्रीय महत्व बढ़ने लगा, और तोमर राजपूतों ने शहर में कई किले और किलेदार दीवारों का निर्माण किया था, जिनमें सबसे प्रमुख लाल क़ोट किला था, जो दिल्ली के सबसे पुराने किलों में से एक था।

दिल्ली शहर की स्थापना के बाद यह एक महत्वपूर्ण राजनीतिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक केंद्र बन गया। तोमर राजपूतों के शासन के बाद, चाहमाना (चौहान) वंश ने दिल्ली पर अधिकार किया और अंत में 12वीं सदी में ग़ोरी साम्राज्य ने इसे अपने अधीन कर लिया।

इस प्रकार, तोमर/तंवर राजपूतों ने दिल्ली की नींव रखी, जो आज भारतीय इतिहास में एक प्रमुख और ऐतिहासिक शहर के रूप में स्थापित है।



तोमर/तंवर (Tomar/Tanwar) के प्रसिद्ध किले और मंदिर


तोमर/तंवर राजपूतों का इतिहास किलों और मंदिरों के निर्माण में भी दिखाई देता है, जिनका आज भी ऐतिहासिक महत्व है। सबसे प्रसिद्ध किला लाल क़ोट किला है, जिसे अनंगपाल तोमर I ने 8वीं सदी में दिल्ली में बनवाया था। यह किला दिल्ली का पहला किला था और इसे तोमर राजपूतों द्वारा स्थापित दिल्ली की नींव माना जाता है। इसके अलावा, अनंगताल जलाशय, जो अनंगपाल तोमर II द्वारा बनवाया गया था, भी दिल्ली के ऐतिहासिक स्थलों में एक महत्वपूर्ण स्थल है।

ग्वालियर किला, जो तोमर राजपूतों के शासनकाल में एक प्रमुख किला था, आज भी मध्य प्रदेश में स्थित है और तोमर राजपूतों का गौरवमयी इतिहास दर्शाता है। इस किले में शानदार महल और मंदिर हैं, जो तोमर साम्राज्य के समृद्धि को दर्शाते हैं।

पारसनाथ मंदिर और कांवली मंदिर जैसे धार्मिक स्थल भी तोमर राजपूतों के संरक्षण में महत्वपूर्ण बने। चिल्लासन माता मंदिर, जो तोमर/तंवर राजपूतों की कुलदेवी का मंदिर है, विशेष रूप से राजस्थान और हरियाणा में प्रसिद्ध है। इस मंदिर की पूजा आज भी उनके वंशजों द्वारा की जाती है।

तोमर/तंवर राजपूतों ने इन किलों और मंदिरों के निर्माण से न केवल अपनी शक्ति और समृद्धि का प्रदर्शन किया, बल्कि इन स्थलों को संरक्षण भी दिया, जो आज भी भारतीय संस्कृति और इतिहास का अहम हिस्सा हैं।



तोमर/तंवर राजपूत किस वंश से संबंधित हैं?



तोमर/तंवर राजपूत चंद्रवंशी (Chandravanshi) वंश से संबंधित हैं। इनका वंश महाभारत के महान नायक अर्जुन से उत्पन्न माना जाता है। अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु और पोते परिक्षित के माध्यम से तोमर राजपूतों की उत्पत्ति होती है। इनकी कुल वंशावली चंद्रवंशी होने के कारण, तोमर राजपूत स्वयं को चंद्रवंशी मानते हैं और उनका संबंध पौराणिक काव्य महाभारत से जोड़ा जाता है।

तोमर/तंवर राजपूतों का यह वंश इंद्रप्रस्थ (जो वर्तमान में दिल्ली के रूप में जाना जाता है) से जुड़ा हुआ था। इनका इतिहास महाभारत से जुड़ा होने के साथ-साथ भारतीय उपमहाद्वीप की ऐतिहासिक धारा में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

इस वंश के राजा अनंगपाल तोमर ने 8वीं सदी में दिल्ली (धिल्लिका) को पुनः बसाया और उसे मजबूत किया। तोमर/तंवर राजपूत इस वंश की प्राचीनता और वीरता के कारण भारतीय इतिहास में एक विशेष स्थान रखते हैं।



निष्कर्ष


तोमर/तंवर (Tomar/Tanwar) राजपूतों का इतिहास भारतीय इतिहास का एक महत्वपूर्ण और गौरवपूर्ण हिस्सा है। इनका संबंध महाभारत के महान नायक अर्जुन से जुड़ा हुआ है, और इनके योगदान को भारतीय संस्कृति, स्थापत्य और राजनीति में हमेशा याद किया जाएगा। विशेष रूप से अनंगपाल तोमर I द्वारा 8वीं सदी में दिल्ली (धिल्लीका) की पुनर्स्थापना और उनके द्वारा बनाए गए किलों और जलाशयों ने भारतीय सभ्यता को समृद्ध किया। उनकी वीरता, शौर्य और धार्मिक परंपराएं आज भी उनके वंशजों द्वारा सम्मानित की जाती हैं। तोमर/तंवर राजपूतों का इतिहास हमें अपने गौरवमयी अतीत को याद रखने और आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।




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